इमाम हसन, हुसैन की शहादत की याद में निकाले गए ताजिए
कोरबा। बुधवार को इस्लामिक नए साल के 10वें दिन इस्लाम धर्म की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार शहर सहित कई स्थानों में मुहर्रम का मातमी जुलूस निकाला गया। करबला में हुए उन्हीं शहीदों की याद में मोहर्रम की 10 तारीख को जुल्म और अत्याचार के खिलाफ प्रत्येक वर्ष की भांति जुलूस निकाला गया। दोपहर से ताजिए निकालने का सिलसिला शुरू शुरू हो गया था, जो देर रात तक चलता रहेगा।
अमन व शांति का पैगाम देते हुए मुस्लिम धर्मावलंबी ने अपने नबी पैंगबर मोहम्मद सअव के नवासों की शहादत की याद में जुलूस निकाला। मुस्लिम धर्मावलंबियों के लिए मोहर्रम का माह नए साल की शुरूआत का है, उनके लिए यह महीना कई मायनों में खास और गमगीन यादों से जुड़ा है। इस्लामिक मान्यताओं के आज से 1400 साल पहले कुफा की सरजमीं करबला पर यजिदियों के द्वारा पैंगबर मोहम्मद स.अ.व. के खानदान व इस्लाम को खत्म करने की सोची समझी रणनीति के तहत 50 हजार से अधिक के लश्कर ने महिला और बच्चों समेत 72 लोगों को तमाम तरह से प्रताड़ित करते हुए शहीद कर दिया गया था। खिलाफत को जारी रखने के लिए कुफ्फारों नें पैंगबर के नवासे हजरत इमाम हुसैन को डेड़ सौ से अधिक खत के जरिए यजीदियों के खिलाफ होने में अपना साथ देने की बात कहकर करबला बुलाया और वहां हजारों की तादाद में तैनात लश्कर ने पैंगबर मोहम्मद सअव के खानदान के साथ जंग छेड़ दी। जंग की जानकारी के बगैर कुफा पहुंचे हजरत इमाम हुसैन के रिश्तेदार और साथी करबला में यजीदियों के जुल्म का शिकार हुए और शहीद हो गए।इस्लाम के जानकार बताते हैं कि हजरत पैगम्बर मुहम्मद के नवासे हजरत हसन और हुसैन अपने बचपन में तरह-तरह के खूबसूरत ताजिये बना कर खेला करते थे। उन्हीं की याद में ये ताजिये बनाए जाते हैं। जिन्हें मुहर्रम के मातमी जुलूस में घुमाया जाता है। मुहर्रम माह के आठवीं तारीख को हजरत हुसैन की शहादत हुई थी। जिनके याद में छोटी ताजिया बनाई जाती है और नवी तारीख को हजरत इमाम हुसैन की याद में बड़ी ताजिया की फातिहा की जाती है। मुस्लिम धर्मावलंबियों की यही कोशिशें होती है कि हजरत इमाम हुसैन की याद में उनके बेहद प्यारी रही खिलौने ताजिये को बेहतर से बेहतर और खूबसूरत बनाया जाए।
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हुसैनी कमेटी ने पिलाई शरबत
बजरंग चौक दीपका में हुसैनी कमेटी गेवरा दीपका के सदस्यों के द्वारा मीठे शरबत का वितरण किया गया। प्यासों को पानी पिलाना पुण्य का काम है। कमेटी के सदस्य सद्दाम ने बताया कि मोहर्रम पर्व पर इसलिए मीठा पानी पिलाया जाता है कि जंग ऐ कर्बला बिना खाना पीना के लड़ी गई थी जिसमे इमाम हुसैन और 72 साथी शाहिद हुए थे। जिनकी याद में यह पर्व प्रतिवर्ष मनाया जाता है।हजरत इब्राहीम कभी भी अपने साथ एक भूखे को अपना मेहमान जरूर बनाते थे और उनके साथ बैठकर खाना खाया करते थे चाहे वो मेहमान ईश्वर में आस्था रखता हो या न रखता हो। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए कमेटी की युवा सदस्यों ने बजरंग चौक में सैकड़ो लोगों को शरबत पिलाकर शहीदों को याद किया।
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