कोरबा। एसईसीएल प्रबंधन की कोयला खदानों और जर्जर सड़कों से उड़ने वाली धूल क्षेत्र के लोगों के लिए समस्या का सबब बन चुकी है। खदानों से कोयला लेकर निकलने वाले भारी वाहनों ने न केवल कॉलोनियों और गांवों की आबोहवा बिगाड़ दी है बल्कि आलम यह है कि खुद क्षेत्रीय महाप्रबंधक कार्यालय भी अब इस धूल के गुबार से अछूता नहीं रह गया है। हैरानी की बात यह है कि जो अधिकारी इस प्रदूषण को रोकने के लिए जिम्मेदार हैं वे खुद धूल भरे कमरों में बैठकर फाइलों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। हवा में उड़ती कोयले की महीन डस्ट अब एसईसीएल के दफ्तरों के भीतर तक प्रवेश कर चुकी है। कर्मचारी और ग्रामीण रोजाना इस काली डस्ट को अपने फेफड़ों में उतारने को मजबूर हैं, लेकिन प्रबंधन प्रदूषण नियंत्रण को लेकर गंभीर नहीं है। खदान आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि कागजों पर क्लीन धरातल पर धूल की स्थिति देखी जा सकती है। जनसुनवाई के दौरान बड़े-बड़े वादे और पर्यावरण संरक्षण की बात कहने वाले पर्यावरण विभाग को लेकर भी लोगों ने आक्रोश जाहिर किया। ग्रामीणों का आरोप है कि जनसुनवाई के समय प्रदूषण नियंत्रण के बेहतर इंतजामों का झांसा देकर कोयला उत्पादन का वार्षिक लक्ष्य तो बढ़ा लिया जाता है, लेकिन धरातल पर धूल ने उड़े इसके लिए पानी का छिड़काव तक नहीं होता। प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि सड़क किनारे रहने वाले परिवारों का जीना मुहाल हो गया है। घरों के भीतर रखी खाने-पीने की चीजों से लेकर बिस्तर तक पर कोयले की परत जम रही है। क्षेत्र के प्रभावित ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही सड़कों पर पानी का नियमित छिड़काव, कोल वाहनों को तिरपाल से ढंकने और डस्ट कंट्रोल के पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए तो उग्र आंदोलन किया जाएगा।
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