प्रतिबंध के बावजूद ग्रामीण पराली में लगा रहे आग, वायु प्रदूषण सहित मिट्टी की उर्वरता पर पड़ सकता है असर

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कोरबा। सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर खेत में पराली जलाने पर भले ही प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन लोगों को इसकी जरा भी परवाह नही है। ग्रामीण अंचल में आए दिन पराली जलाए जाने के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जिसमें पराली की आग ने पेड़ पौधों को चपेट में ले लिया। जब तक आग पर काबू पाया जाता, भारी संख्या में पेड़ पौधे जलकर खाक हो चुके थे। सुखद तो यह रहा कि आग आबादी वाले क्षेत्र तक नही पहुंची। औद्योगिक प्रतिष्ठानो में आधुनिकीकरण के कारण मजदूरों पर निर्भरता कम होती जा रही है। इसका असर खेती किसानी पर भी पड़ा है। पहले किसान खेतों में हल चलाने, निंदाई गुड़ाई व फसल की कटाई सहित तमाम कामकाज मजदूरों से कराते थे। अब खेती किसानी के लिए भी आधुनिक उपकरण के प्रति लगाव बढ़ता जा रहा है। जहां खेतों में ट्रैक्टर सहित अन्य उपकरणों से जुताई की जाती है, वहीं फसल कटाई और मिंजाई के लिए हावेस्टर व थे्रसर जैसी मशीने आ गई है। इन मशीनों से खेतों में ही कटाई व मिंजाई कर उपज को किसान घर ले जाते हैं, जबकि पराली खेत में ही रह जाता है। जिसे सूखने पर आग के हवाले कर दिया जाता है। जिसका दुष्परिणाम मवेशियों के लिए चारे की कमी और प्रदूषण के रूप में सामने आता है। पराली के जलने से उठने वाला धुआं सेहत के लिए घातक होता है। जिसके मद्देनजर केंद्र व राज्य सरकार ने पराली के जलाने पर रोक लगा दी है। बावजूद इसके आए दिन खेतों में रखे पराली जलाने के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसी ही घटना भैसमा और आसपास के क्षेत्र में सामने आई है। बताया जा रहा है कि भैसमा क्षेत्र में किसी ने खेत में रखे पराली को आग के हवाले कर दिया। यह आग हल्की हवा की झोंकों के साथ तेजी से फैल गई। आग ने आसपास लगे पेड़ पौधों को अपनी चपेट में ले लिया। पेड़ पौधे जलकर खाक हो गए। यदि समय रहते किसानों को जागरूक नही किया गया तो वह दिन दूर नही जब लोग पराली की नष्टीकरण के लिए लोग आग को ही साधन बना लेंगे। जिसका खामियाजा लोगों को भुगतना पड़ सकता है। जानकारों की मानें तो एनजीटी के निर्देशानुसार शासन ने पराली जलाने वालों पर जुर्माना और सजा का प्रावधान निर्धारित किया है। यदि दो एकड़ से कम जमीन में पराली जलता है तो ढाई हजार, 5 एकड़ तक पांच हजार व इससे अधिक होने पर 15 हजार तक जुर्माना का प्रावधान रखा गया है। इसकी मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी कृषि, राजस्व व पंचायत विभाग को दी गई है। बताया जा रहा है कि कटाई व मिंजाई के बाद फसल को किसान घर ले जाते हैं। खेतों में पराली को छोड़ दिया जाता है। जिसे सूखने के बाद आग के हवाले कर दिया जाता है। इसके पीछे उद्येश्य खरपतवार को नष्ट करना होता है, लेकिन पराली के जलने से न सिर्फ वायु प्रदूषण होता है, बल्कि मिट्टी की उर्वरक क्षमता नष्ट होती है। खेतों में उगी घास के जलने से मवेशियों को चारा भी नही मिल पाता।

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