Saturday, February 14, 2026

फसल और जान बचाने रतजगा कर गुजारनी पड़ रही रात, जागी आंखों से पूरी रात करनी पड़ रही निगरानी

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फसल और जान बचाने रतजगा कर गुजारनी पड़ रही रात, जागी आंखों से पूरी रात करनी पड़ रही निगरानी

कोरबा। हाथियों का उत्पात थमने का नाम नहीं ले रहा है। हाथी किसानों की मेहनत पर पानी फेर रहे हैं। हाथियों के विचरण से फसल चौपट हो रही है। साथ ही जान माल का खतरा भी बना हुआ है। जिसे लेकर प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों को रतजगा कर रात गुजारनी पड़ रही है। फसल और जान बचाने जागी आंखों से निगरानी करना उनकी मजबूरी है। जिले दोनो ही वन मंडलों के प्रभावित गांवों में फसल बचाने के लिए लोगों की रातें मचान में कट रही। ग्रामीण पारी बना कर रात ही नहीं बल्कि दिन में धान की रखवाली कर रहे हैं। रात के समय हाथ में टार्च और मशाल उनका मुख्य हथियार होता है। जागने वाला पहरेदार हर 15 से 20 मिनट के अंतराल में चारों ओर टार्च घूमाकर देखता है कि कहीं हाथियों का समूह तो नहीं आ रहा। मचान पर चढ़े किसान मोबाइल से हाथी मित्रदल और वन विभाग के टीम के संपर्क में रहते हैं। मशाल और हूटिंग से हाथियों को भगाने का प्रयास करते हैं। सुगंधित धान की खेती किसानों के लिए जी का जंजाल बन गया है। हाथियों को भी यह धान बहुत भाता है। यही वजह है कि करतला, केंदई क्षेत्र के किसानों की खेत में घुस कर हाथी धान को चट कर जा रहे। इसका असर सुगंधित धान की रकबा पर भी पड़ रहा। बीते वर्ष जिले 600 हेक्टेयर में सुगंधित धान की खेती की गई थी, पर वह घट कर 100 हेक्टेयर में सिमट गई है। इन दिनों खेतों में लहलहाती सुगंधित धान की सुगंध की वजह से हाथी करतला रेंज के प्रभावित गांव के इर्द- गिर्द डेरा डाल रखें हैं।ग्रामीण क्षेत्रों में हाथियों की दस्तक से लोगों में डर का माहौल बना हुआ है। लहलहाती धान की पुसल खास कर सुगंधित धान हाथियों के लिए बेहतर चारा साबित हो रहा है। धान में आ रही बालियों को खाने से अधिक रौंदे जाने से नुकसान हो रहा है। वन विभाग के अधिकारियों की माने तो ग्राम बनिया के निकट जंगल में विचरण कर रहे हाथियों के दल में दो बच्चे भी शामिल हैं। करीब एक माह पहले ही इनका जन्म हुआ है। यही वजह है कि हाथी एक जगह से दूसरी जगह नहीं जा रहे। विभागीय स्तर पर प्रयास किया जारहा है कि हाथी जंगल की ओर चले जाएं। ज्यादातर ऐसे किसानों ने सुगंधित धान का फसल लिया है जिनके खेत गांव के नजदीक है। इसके अलावा बाड़ियों में भुट्टा और सब्जियों की फसल के कारण हाथी गांव की सरहद तक पहुंच जा रहे है। पखवाड़े भर के भीतर पसान, केंदई और जटगा रेंज के आसपास के खेतों में 13 एकड़ से भी अधिक फसल को क्षति पहुंचाया है। वहीं हाथियों ने छह मकानों को ध्वस्त कर दिया है। हाथियों की धमक से कच्चे आवास मेंरहने वाले ग्रामीण रात में आंगनबाड़ी अथवा स्कूल में आश्रय लेकर दिन गुजार रहे हैं। साल भर की कमाई को हाथी कहीं पल भर में नष्ट न कर दें, इस आशंका के बीच प्रभावित गांव के किसानों के दिन बीत रहे। करतला रेंज के चारमार, घोंटमार, कोई, बोतली, सुईआरा, घिनारा, मदवानी, पतरापाली, टेंगनमार, बोतली, तराईमार, चांपा जोगीपाली हाथी प्रभावित गांव में आते हैं। इसी तरह कटघोरा वनमंडल के पसान वन परिक्षेत्र से लगे बनिया, पनगंवा, परला, रोदे, अरसरा, सेमरहा, जलके गांव में हाथियों का आवागमन ज्यादा है।
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केंदई रेंज में भटक रहा हाथी
केंदई में रेंज में एक माह से भटक रहे लोनर चेतक हाथी को अभी भी दल से नहीं मिलाया जा सका है। यह अब तक चार लोगों की जान ले चुका है। हाथी को दल से मिलाने के लिए अंबिकापुर से विशेषज्ञ दलों को बुलाया गया था। दो बार मिलाने का प्रयास किए जाने के बाद भी सफलता नहीं मिली। हाथी केंदई जंगल को छोड़कर इन दिनों पसान के जंगल में विचरण कर रहा। लोनर की संख्या एक से बढ़कर तीन हो गई है।
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वन अमला है अलर्ट
ग्रामीणों को जंगल की ओर नहीं जाने की चेतावनी दी जा रही है।जिले का सबसे अधिक प्रभावित वन परिक्षेत्र पसान को वन संरक्षण की दृष्टि से 16 बीट में विभाजित किया गया है। यहां केवल 10 बीट में गार्ड है। रिक्त छह बीट को प्रभारी गार्ड के भरोसे छोड़ा गया है। संसाधन की कमी से जूझ रहे जंगल में लोगों को हाथी के विचरण की गतिविधियों का समय पर पता नहीं चल पा रहा। यही वजह है कि जनधन की हानि साल दर साल बढ़ती जा रही है।

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