कोरबा। गुरुवार को सुदशा दशमी लक्ष्मी व्रत पारंपरिक रीति-रिवाज और गहरी आस्था के साथ मनाया गया। इस अवसर पर महिलाओं में विशेष उत्साह और श्रद्धा देखने को मिली। व्रत की तैयारियां एक दिन पूर्व से ही प्रारंभ हो गई थीं। महिलाओं ने अपने-अपने घरों, आंगन एवं पूजा स्थलों की साफ-सफाई कर उन्हें पवित्र किया। कई घरों में आंगन को गोबर से लीपकर शुद्ध किया गया, जिससे वातावरण में पारंपरिक सुगंध और पवित्रता का भाव व्याप्त हो गया। गुरुवार की सुबह महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हुई और स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद आंगन एवं पूजा स्थल में चावल के घोल से सुंदर अल्पना बनाई गई, जो समृद्धि और मंगल का प्रतीक मानी जाती है। पूजा स्थान पर विधिपूर्वक मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित की गई। प्रतिमा को हल्दी मिश्रित जल से पखारकर शुद्ध किया गया तथा चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित कर तिलक लगाया गया। पूजा के दौरान महिलाओं ने विधि-विधान से मंत्रोच्चार करते हुए मां लक्ष्मी की आराधना की। खीर, पूड़ी, फल, नारियल एवं अन्य मिष्ठान का भोग लगाया गया। कई घरों में सामूहिक रूप से लक्ष्मी जी के भजन-कीर्तन भी किए गए, जिससे वातावरण भक्तिमय बना रहा। पंडितों ने बताया कि सुदशा व्रत अत्यंत विशेष और फलदायी माना जाता है। उन्होंने कहा कि जिस माह में दशमी तिथि गुरुवार के दिन पड़ती है, वही दिन मां लक्ष्मी की विशेष पूजा के लिए शुभ माना जाता है। इस वर्ष कई वर्षों बाद ऐसा शुभ संयोग बना था, जिसके कारण व्रत का महत्व और भी बढ़ गया। श्रद्धालुओं ने इस दुर्लभ योग को अत्यंत शुभ मानते हुए विधिवत पूजा-अर्चना की। इस दिन लहसुन और प्याज का सेवन पूरी तरह वर्जित रखा गया। सात्विक भोजन ही ग्रहण किया गया व रात्रि में चावल की रोटी बनाकर प्रसाद स्वरूप खाया गया। व्रत की विशेष परंपरा के अनुसार महिलाओं ने अपने पतियों के चरण पखारकर उनकी आरती उतारी और उनके दीर्घायु, सुख-समृद्धि एवं परिवार की खुशहाली की कामना की। इस भावनात्मक परंपरा ने पारिवारिक एकता और सम्मान की भावना को और मजबूत किया। पूजा सम्पन्न होने के बाद परिवार के सभी सदस्यों ने प्रसाद ग्रहण किया तथा पड़ोसियों और रिश्तेदारों के बीच भी प्रसाद वितरित किया गया। इससे सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे का संदेश प्रसारित हुआ।
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