एनजीटी के नियमों की उड़ाई जा रही जमकर धज्जियां,प्रतिबंध के बाद भी घाटों का चीर रहे सीना
कोरबा। 15 अक्टूबर तक नदी, लायसेंसी घाट से रेत खनन पर प्रतिबंध लगाए जाने के बावजूद जिस तरीके से व जिस पैमाने पर बेधडक़ होकर रेत खोदी जा रही है, यह नि:संदेह भाजपा के सुशासन की नीति को धता बता रहा है। महंगी रेत, रेत के अवैध खनन और परिवहन को लेकर भारतीय जनता पार्टी के पदाधिकारी तो खामोश हैं ही, विपक्ष को भी कोई मतलब नहीं। अधिकारीयों को भी कोई सरोकार नहीं रह गया है। जिले के शहरी इलाकों,उपनगरों व ग्रामीण अंचलों में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (हरित विकास प्राधिकरण) के नियम-कायदे बिल्कुल भी लागू नहीं होते। अगर भूले-भटके लागू हुए भी तो, सिर्फ और सिर्फ कागज में। यहां पर्यावरण संरक्षण विभाग का मैदानी अमला गायब है, अवैध खनन-परिवहन रोकने के लिए गठित टास्क फोर्स की टीम नदारद है,पुलिस अधिकारियों ने अपना विभाग नहीं बताकर हाथ खींच रखे हैं और माइनिंग अमला संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। दिन भर तो अवैध काम तथाकथित रॉयल्टी, भंडारण अनुमति की आड़ में तो चलते हैं, लेकिन रात का अंधेरा गहराने के साथ ही सन्नाटे को चीरते हुए बीच नदी में उतरकर जेसीबी के माध्यम से नदी का जिस तरह से सीना छलनी किया जा रहा है। वह बताने के लिए काफी है कि कानून-कायदे कितने भी बना लो, उल्लंघन करने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। कानून के दावपेंच और विभागीय नियमों की शिथिलता का इन्हें गहराई तक ज्ञान है। सर्वमंगला पुलिस चौकी और सिविल लाइन थाना क्षेत्र की सीमा में आने वाले हसदेव नदी तट के एक तरफ बरमपुर और दूसरी तरफ राताखार स्थित है। इन दोनों के बीच से होकर बहने वाली हसदेव नदी का नजारा सोमवार रात पेश आया जिसमें स्थानीय युवक ने नदी में जेसीबी लगाकर रेत खोदने का वीडियो बनाया है। सर्वमंगला पुलिस चौकी से गुजर कर शराब भट्टी के बगल से होते हुए बरमपुर क्षेत्र के हसदेव नदी में जाकर रेत खोदी जा रही है और नदी के दूसरे छोर राताखार से भी रेत को सहूलियत के हिसाब से निकलकर रातों-रात आपूर्ति किया जा रहा है। रेत माफिया इस तरह चालाक हैं कि भंडारण की रेत को सुरक्षित रखा जा रहा है और नदियों से खोदी जा रही रेत को संबंधित लोगों को आपूर्ति की जा रही है। भंडारण की रेत बाद में खपाये जाने की नीति है, लेकिन सवाल यह है कि रात भर शहर के मुख्य मार्गो से होकर टीपर और ट्रैक्टर में रेत भरकर गुजरते हैं, गीली रेत का पानी सडक़ों पर गिरते हुए उनके चोरी की कहानी बयां करता है लेकिन यह पूछने और धरपकड़ करने वाला कोई नहीं कि प्रतिबन्ध के बाद भी नदी क्यों खोदे। इन पर चोरी का प्रकरण नियमत: बनता है पर बनाएगा कौन? इस कारण से रॉयल्टी की, भंडारण की रेत तो महंगी है ही, चोरी की बिना रायल्टी वाली रेत भी महंगी है।
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