Saturday, January 24, 2026

बागियों पर कार्रवाई में भाजपा दोहरा मापदंड, निगम और जनपद के बागियों पर कार्रवाई, जिला पंचायत में अभयदान

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बागियों पर कार्रवाई में भाजपा दोहरा मापदंड, निगम और जनपद के बागियों पर कार्रवाई, जिला पंचायत में अभयदान

कोरबा। भाजपा अपने अनुशासन के लिए जानी जाती है। इसका उदाहरण पार्टी ने नगर निगम और जनपद पंचायत चुनाव में बागी होकर चुनाव लडऩे वालों को 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है, दूसरी जिला पंचायत के बागी जिन्होंने पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव लड़ा उन पर कोई कार्रवाई अब तक नहीं हुई है। बागियों पर कार्रवाई में भाजपा दोहरे मापदंड की जमकर चर्चा है। छत्तीसगढ़ भाजपा में सियासी हलचल मची हुई है जो कोरबा से शुरू होकर दिल्ली तक को हतप्रभ किये हुए है। कोरबा नगर निगम में सभापति का चुनाव में प्रचंड बहुमत के बाद भी गच्चा खा जाने के बाद भाजपा संगठन दिल्ली तक हिला हुआ है। देश भर में संगठन ने जिस पर हाथ रख दिया, उसके खिलाफ किसी ने चूँ तक न की। कोरबा में पार्टी द्वारा घोषित प्रत्याशी हितानंद अग्रवाल के विरुद्ध लडऩे वाले भाजपा पार्षद सभापति नूतन सिंह को छह साल के लिए निकाल दिया गया। इसके बाद जांच के लिए पूर्व् विधानसभा अध्यक्ष गौरीशंकर अग्रवाल के नेतृत्व में टीम पूछताछ कर कोरबा से चली गई, पर यह टीम भी हैरत में है। बगावत के बीच कोरबा जनपद पंचायत में अध्यक्ष-उपाध्यक्ष में भी खेला होने पर जनपद सदस्य मोनिका भगत के साथ उनके पति अरविंद तथा सदस्य चंद्रकला राजपूत के साथ उनके पति कृष्णा सिंह राजपूत को भी निकाल दिया गया है लेकिन जिला पंचायत में ऐसा नहीं हुआज्.! जब पार्टी अनुशासन की बात करती है तो जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में भी अनुशासनहीनता जमकर हुई है। जिला भाजपा भले ही डॉ.पवन सिंह को निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष घोषित करवा कर अपनी पीठ थपथपा रही है, लेकिन यदि बागियों का निष्कासन कर दिया जाता तो यहां तस्वीर कुछ और होती। बगावत की वजह से भाजपा के वरिष्ठतम आदिवासी नेता पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर की बहू को हार का सामना करना पड़ा, तो क्या इसे संगठन अनुशासनहीनता नहीं मानता? चूंकि उसने अपने 11 प्रत्याशी बाकायदा समर्थित घोषित किए थे, प्रत्याशी घोषित किए गए तो उनके विरुद्ध लडऩे वाले बागी कहलाए जाकर बेशक निष्कासन की पात्रता रखते होंगे। सवाल उठे हैं कि क्या भाजपा संगठन लाभ और नुकसान को देखते हुए दोहरी नीति अपनाता है? यदि नहीं, तो उन बागियों पर अब तक निष्कासन जैसी कोई कार्रवाई नहीं हुई जिन्होंने जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में घोषित प्रत्याशी के विरुद्ध जाकर चुनाव लड़ा है? इस अनुशासनहीनता पर कार्रवाई लम्बित होने के साथ यह सवाल पार्टीजनों सहित राजनीति में रुचि रखने वालों में बार-बार कौंध रहा है कि इन्हें बख्शा क्यों जा रहा है।
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इन्होंने की बगावत, कार्रवाई कब
भाजपा समर्थित प्रत्याशी क्षेत्र क्रमांक 1 से श्रीमती निर्मला संदीप कंवर (ननकीराम कंवर की बहू) के विरुद्ध बागी प्रत्याशी के रूप में श्रीमती रेणुका राठिया चुनाव लड़ी व जीती। क्षेत्र क्रमांक 2 से भाजपा समर्थित प्रत्याशी सुष्मिता कमलेश अनंत के खिलाफ भाजपा के ही दो बागी प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा। क्षेत्र क्रमांक 3 से भाजपा समर्थित श्रीमती हेमलता राठिया के विरुद्ध भाजपा की ही श्रीमती सावित्री अजय कंवर ने जीत हासिल की। जिला पंचायत क्षेत्र क्रमांक 04 से भाजपा समर्थित प्रत्याशी अंत राम यादव के विरुद्ध भाजपा जिला उपाध्यक्ष पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ झाम लाल साहू चुनाव लडे और भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। क्षेत्र क्र. 07 में भाजपा समर्थित निकिता जायसवाल के विरुद्ध सुनील शर्मा व उषा विश्वकर्मा ने चुनाव लड़ा। क्षेत्र क्र. 08 में भाजपा समर्थित माया रुपेश कँवर के विरुद्ध धनेश्वरी सिंद्राम ने चुनाव लड़ा। क्ष्रेत्र क्रमांक 9 में भाजपा समर्थित विजय जगत के खिलाफ बागी होकर भाजपा के ही गणराज सिंह कँवर लड़े। क्षेत्र क्रमांक 10 में समर्थित घोषित शांति मराबी के विरोध में बीजेपी से ही विनीता देवी तंवर चुनाव लड़ी। क्षेत्र क्रमांक 11 में ठंडी लाल बिंझवार समर्थित प्रत्याशी के विरोध में राम नारायण उरेती, चंद्रप्रताप उर्रे चुनाव लड़े। यहां तो यह भी चर्चा है कि बीजेपी के पूर्व मंडल अध्यक्ष तक ने बीजेपी प्रत्याशी क़ा सहयोग नहीं किया था।

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