कोरबा। जिले में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं की दो दिवसीय हड़ताल के कारण गुरुवार को आंगनबाड़ी केंद्रों में ताले लटके रहे। शुक्रवार को भी दूसरे दिन आंदोलन के साथ रैली निकाल कर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व अन्य मंत्रियों के नाम से डिप्टी कलेक्टर तुलाराम भारद्वाज को ज्ञापन सौंपी गई। इससे नौनिहालों की पोषण आहार गतिविधि प्रभावित रही। गुरुवार सुबह 11 बजे आई टी आई तानसेन चौक रामपुर में हड़ताल की शुरुआत हुई। ब्लॉक स्तर पर भी आंदोलन किया गया। शुक्रवार को भी उन्होंने मांगों को पूरा करने आवाज बुलंद की। कार्यकर्ता और सहायिकाएं तीन सूत्रीय मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। उनका कहना है कि देश में आईसीडीएस योजना को लागू हुए 50 वर्ष पूरे हो चुके हैं और विभाग स्वर्ण जयंती मना रहा है, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यरत कार्यकर्ताओं को अभी भी सम्मानजनक मानदेय और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 के बाद से मानदेय में कोई वृद्धि नहीं की है। वर्तमान में कार्यकर्ताओं को 4500 रुपए और सहायिकाओं को 2250 रुपए प्रतिमाह मानदेय मिल रहा है, जो महंगाई के दौर में बेहद कम है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-सहायिका संयुक्त के प्रांतीय आह्वान पर 26 और 27 फरवरी को दो दिवसीय कार्य बहिष्कार किया गया आंदोलनकारी कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं होने पर आगे और उग्र आंदोलन किया जाएगा।
कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की ये हैं प्रमुख मांगें
0 शासकीयकरण व पदोन्नति: आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को नियमित कर्मचारी घोषित किया जाए और अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर पर्यवेक्षक पद पर विभागीय पदोन्नति दी जाए।
0 जीने लायक वेतन: शासकीयकरण तक कार्यकर्ता को 26 हजार रुपए और सहायिका को 22,100 रुपए प्रतिमाह वेतन दिया जाए।
0 सामाजिक सुरक्षा: सेवानिवृत्ति पर पेंशन, ग्रेच्युटी, समूह बीमा और असामयिक मृत्यु पर एकमुश्त सहायता राशि की व्यवस्था की जाए।
महामारी और एसआईआर के काम में अहम भूमिका
कार्यकर्ताओं ने बताया कि कोविड महामारी, निर्वाचन कार्य और एसआईआर जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में भी उनकी भूमिका रही है। इसके बावजूद शासकीयकरण, विभागीय पदोन्नति, पेंशन, ग्रेच्युटी, समूह बीमा, कैशलेस चिकित्सा सुविधा और पारिवारिक दायित्वों के लिए अवकाश जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि वर्ष 2026-27 के केंद्रीय और राज्य बजट में भी उनकी मांगों को शामिल नहीं किया गया, जिससे देशभर के करीब 28 लाख और छत्तीसगढ़ के लगभग एक लाख आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-सहायिकाओं में आक्रोश है।
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