मीन संक्रांति से होगा खरमास शुरू, एक माह तक नहीं होंगी शादियां

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कोरबा। 14 अप्रैल को सूर्य के मेष राशि में प्रवेश के साथ फिर शुरू हो जाएंगे मांगलिक कार्य
कोरबा। मीन संक्रांति के साथ 14 मार्च से खरमास लग रहा है, जो 14 अप्रैल तक चलेगा। इस एक माह की अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन, यज्ञोपवीत जैसे सभी मांगलिक और शुभ कार्यों पर विराम लग जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा-पाठ, दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व रहता है।
ज्योतिषाचार्यों ने बताया कि 14 मार्च को दोपहर 12 बजकर 57 मिनट पर सूर्य कुंभ राशि से निकलकर मीन राशि में प्रवेश करेगा। सूर्य के मीन राशि में प्रवेश करते ही मीन संक्रांति के साथ खरमास शुरू होगा। इसके बाद 14 अप्रैल को दोपहर करीब 2 बजकर 35 मिनट पर सूर्य मेष राशि में प्रवेश करेगा, जिसके साथ ही खरमास समाप्त हो जाएगा और मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त फिर से शुरू हो जाएंगे। पंडितों का कहना है कि धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक विवाह के शुभ मुहूर्त के लिए वृष, मिथुन, कन्या, तुला, धनु और मीन लग्न को शुभ माना जाता है। वहीं अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, मघा, चित्रा, स्वाति, हस्त, अनुराधा और उत्तरा फाल्गुन जैसे नक्षत्रों में विवाह संस्कार के लिए अनुकूल योग बनते हैं। पंडितों का कहना है कि इस वर्ष अधिक मास का भी संयोग बन रहा है। ज्येष्ठ मास इस बार दो माह तक रहेगा, जिसके कारण 15 मई से 17 जून तक मलमास रहेगा। इस अवधि में भी शादी-विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं होंगे। इसके बाद 25 जुलाई से 20 नवंबर तक चातुर्मास का समय रहेगा। इस समय भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं। इस दौरान भी मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है। पंडितों ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं तो उस अवधि को खरमास कहा जाता है। इस समय सूर्य की ऊर्जा और प्रभाव अपेक्षाकृत मंद माने जाते हैं, जिसके कारण विवाह और अन्य शुभ संस्कारों के लिए अनुकूल योग नहीं बनते। वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह जैसे मांगलिक कार्यों के लिए सूर्य, गुरु और शुक्र का शुभ स्थिति में होना आवश्यक माना जाता है। इनमें से किसी एक के भी कमजोर होने पर शुभ मुहूर्त नहीं बनता, इसलिए इस अवधि में मांगलिक कार्यों को टाल दिया जाता है।
पूजा-पाठ और दान का भी है विशेष महत्व
पंडितों ने बताया कि धार्मिक दृष्टि से खरमास का समय अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु की पूजा, मंत्रजाप, यज्ञ, दान और तीर्थ स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस अवधि में किए गए दान-पुण्य और धार्मिक कार्यों से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

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