उम्र दराज कर्मियों के भरोसे एसईसीएल का कोयला उत्पादन, 70 फीसदी से अधिक कर्मियों की उम्र 45 से ज्यादा
कोरबा। एसईसीएल की खदानों में 70 फीसदी से अधिक कोल कर्मियों की उम्र 45 से 60 के बीच है। बढ़ती उम्र के साथ कई बीमारियों के चपेट में भी आ चुके हैं। हर साल बढ़ रहा कोयला खनन का टारगेट अब इन्हीं कर्मियों के कंधे पर निर्भर है। हालांकि प्रबंधन का कहना है कि ऐसे कर्मी जो शारीरिक रूप से जोखिम वाले कार्य करने में असक्षम है उनसे गैर जोखिम वाले ही कार्य कराए जाते हैं। लंबे समय से एसईसीएल में कर्मियों की भर्ती नहीं हुई है। पूरा जोर ठेका पद्धति की ओर है। सरकार और प्रबंधन दोनों का ही ठेका मजदूरों पर अधिक फोकस है। आम नौकरी पेशे की तरह खदानों में नियमित कर्मी सेवानिवृत्त होने तक सौ फीसदी क्षमता नहीं दे पाते हैं। एक उम्र के बाद जोखिम भरा काम करने से वे खुद पीछे हट जाते हैं। प्रबंधन की भी कोशिश रहती है कि ऐसे कर्मियों से बगैर जोखिम वाले क्षेत्र में काम लिया जा सके। ताकि किसी तरह का हादसा न हो। इसका सबसे बड़ा असर ये पड़ रहा है कि जिन जगहों पर एक अनुभव और तकनीकी जानकारी वाले नियमित कर्मी की जरुरत होती है वहां ठेका कामगारों से काम लिया जाता है। एसईसीएल की कुसमुंडा, गेवरा, दीपका मेगा परियोजना की अगर बात करें तो नियमित कर्मियों की संख्या की तुलना में ठेका मजदूरों की संख्या 10 से 15 फीसदी ही कम है। आने वाले एक-दो वर्षों में ठेका मजदूरों की संख्या नियमित से अधिक हो जाएगी। औसत 15 से 25 हजार वेतन और बिना किसी तरह की अन्य सुविधाओं वाले इन कर्मियों से ही हर विभाग में काम लिए जा रहे हैं। एसईसीएल में 45 से 60 आयू वाले कर्मियों की संख्या सबसे अधिक है। बगदेवा में 70 फीसदी, सिंघाली में 80, बलगी में 87, गेवरा में 65, कुसमुंडा में 75, दीपका में 80, रानीअटारी में 50 फीसदी, सुराकछार में 40 फीसदी, विजयवेस्ट में 50 फीसदी कर्मियों की उम्र 45 से अधिक है।
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कोयला उत्पादन पर पड़ रहा असर
उम्र दराज कर्मियों का असर एसईसीएल की कोयले की खदानों के वार्षिक और हर महीने के लक्ष्य पर भी पड़ रहा है। हालांकि टारगेट से पिछडऩे की कई और वजह भी है। बारिश, जमीन अधिग्रहण, भूविस्थापितों के आंदोलन के साथ-साथ नियमित कर्मियों की भर्ती नहीं होना भी एक वजह है। पहली छमाही में आधिकांश खदानें टारगेट से पीछे थी।
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