Wednesday, February 11, 2026

भाजपा शासन में भूपेश के ड्रीम प्रॉजेक्ट पर संकट के बादल, नरवा गरुआ, घूरवा बारी को लेकर सता रही चिंता

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भाजपा शासन में भूपेश के ड्रीम प्रॉजेक्ट पर संकट के बादल, नरवा गरुआ, घूरवा बारी को लेकर सता रही चिंता

कोरबा। प्रदेश में सरकार बदल गई है और इसके साथ ही संभव है कि पुरानी परंपरा पर चलते हुए कई योजनाएं बंद कर दी जाएं या उनका स्वरूप परिवर्तित हो। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार की सबसे बड़ी योजना और भूपेश के ड्रीम प्रोजेक्ट नरवा गरुआ, घूरवा बारी भी उन्हीं में एक है। हालांकि अब तक इसे लेकर कोई नया निर्देश नहीं है और जीतने भी सक्रिय गोठान हैं, वे अब भी पहले की तरह ही संचालित किए जा रहे हैं। गोठान से अपनी आजीविका चला रहे ग्रामीणों का कहना है कि बड़े परिश्रम से इसे संजोया गया है। उम्मीद है कि आम लोगों की जिंदगी से जुड़ चुके गोठनों को बंद नहीं किया जाएगा। हालांकि उन्हें इस बात की चिंता भी सताने लगी है कि आगे उनके गोठानों का क्या होगा। किसी ने कहा कि आचार संहिता लागू होने के बाद से गोबर खरीदी बंद है, तो कोई यह कह रहा है कि खेती किसानी का सीजन शुरू होने के बाद से ज्यादातर लोग कृषि कार्य में व्यस्त हो गए। खेतों और फसलों की देखरेख के बाद कटाई, मिंजाई और अब उपज को मंडी ले जाने की दौड़ के बीच गोठान अभी सूने ही पड़े हैं। इन जरूरी कामों से मुक्त होकर एक बार फिर वे अपने गोठान से जुड़ जाएंगे। गांव के सरपंच, पूर्व सरपंचों का यही मत है कि गोबर, गाय, पैरा और घुरवा, बारी तो गांव की पहचान है। इनसे गांव में रहने वाला लगभग हर परिवार अपने दिनचर्या का ज्यादातर समय गाय गोबर से जुड़ा ही रहता है। ऐसे में गोठान से अपने जीवन को बेहतर बनाने में सक्षम बन रहे परिवार और खासकर स्व सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं को इससे वंचित न करें, तो बेहतर रहेगा। उनका कहना है कि गोठनो के निर्बाध चलते रहने से किसी को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन उन्हें बंद कर दिए जाने से सैकड़ों परिवार की आस टूट सकती है और कई हाथों से काम भी छिन सकता है। इसलिए उन्हें उम्मीद है कि नई सरकार जो भी निर्णय लेगी, वह आम जनों और गांव गरीब के हित के अनुरूप ही होगा। विभाग के अनुसार जिले में कुल 331 गौठान संचालित हैं। इनमें से ढाई सौ से अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जहां गोबर खरीदी तो की जाती ही रही, आजीविका के कई अन्य गतिविधियां भी संचालित होती रहीं हैं। इनमें माहोरा और चिर्रा जैसे गौठान भी हैं, जहां समूह की महिलाएं दोना पत्तल और मशरूम समेत कई अन्य कारोबार में अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूती देने की कोशिशों में जुटी काफी मेहनत भी कर रहीं हैं।

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