मानसून का संदेश लेकर आए विदेशी पक्षी ठंड की दस्तक के साथ लौटने लगे घर, कनकी में पूरा हुआ पक्षियों का प्रवास काल
कोरबा। जाड़े की दस्तक के साथ ही मानसून का संदेश लेकर श्रीलंका सहित कई देशों से आने वाले पक्षियों का प्रवास काल कनकी में पूरा हो चुका है। अब वे अपने बच्चों के साथ मीलों का सफर पूरा कर स्वदेश लौट जाएंगे। दशकों से यह खास किस्म के पक्षी घोंगिल ओपनबिल्ड स्टॉर्क जिले के कनकेश्वर धाम को अपने प्रवास का सबसे प्रिय स्थान बना लिया है। वे यहां प्रजनन के लिए आते हैं। इनके आने का समय अमूमन जून में होता है। जब शिव की आराधना के पवित्र माह सावन की भी शुरूआत होती है। भगवान शिव की आराधना के लिए प्रख्यात कनकेश्वर धाम में पक्षियों का आगमन शिव की आराधना से जुड़ा हुआ है।ग्रामीण इन पक्षियों को आस्था से जोडक़र देखते हैं। बरसात की शुरूआत में इनका आगमन होने के करण इन्हें मानसून का सूचक भी माना जाता है। अब ठंड की शुरुआत होते ही पक्षी वापस लौटने लगे हैं। इन पक्षियों के प्रवास से वहाँ के स्थानीय निवासियों में लीवरफ्लूक जैसी बीमारियां जो मनुष्य व उनके पालतू जानवरों में बुखार यकृत की बीमारी पित्ताशय की पथरी,डायरिया अदि पेट से सम्बन्धित बीमारी के कारण बनते हैं। वह इन पक्षियों की मौजूदगी से काफूर हो जाती हैं। चूंकि इन परजीवियों का वाहक घोंघा मोलस्क होता है जिसके द्वारा खेतों में काम करने वाले मनुष्यों और जलाशयों व चरागाहों में चरने व पानी पीने वाले पशुओं को यह परजीवी संक्रमित कर देता है। इन पक्षियों की मौजूदगी से यहां घोंघे लगभग पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। जिससे यह परजीवी अपना जीवनचक्र पूरा नहीं कर पाते और इनसे फैलने वाला संक्रमण रूक जाता है। इन रोगों की यह एक प्राकृतिक रोकथाम है। इन पक्षियों के मल में भी फॉस्फोरस नाइट्रोजन यूरिक एसिड आदि कार्बनिक तत्व होजक हैं जो पानी के साथ बहकर आस-पास के खेतों की उर्वरकता बढ़ाता है।गांव कनकी की जलवायु में प्रवासी पक्षियों को प्रजनन काल के लिए उपयुक्त वातावरण मिलता है। जिसके कारण ही यहां पिछले कई दशकों से यह सिलसिला लगातार चलता आ रहा है। मुख्यतौर पर यह पक्षी दक्षिण पूर्व एशिया,श्रीलंका और दक्षिण भारत में भी पाए जाते हैं। जिनकी 20 से अधिक प्रजातियां विश्व में मौजूद हैं।
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इन पेड़ों पर बनाते हैं घोंसला
यह अपने घोसले इमली बरगद पीपल,बबूल व बांस के पेड़ों पर बनाते हैं। स्टार्क पक्षी 10 से 20 हजार की संख्या तक अपने घोंसले बनाते हैं। एक पेड़ पर 40 से 50 घोसले हो सकते हैं। प्रत्येक घोसले में 4 से 5 अण्डे होते हैं। सितम्बर के अंत तक इनके चूजे बड़े होकर उडऩे में समर्थ हो जाते हैं। घोसलों का स्थान भी निश्चित होता है। जहां प्रत्येक वर्ष यह जोड़ा उन्ही टहनियों पर घोसला रखता है जहां पूर्व के वर्ष में था।
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