कोरबा। बुधवार को चांद दिखने की तस्दीक होने के साथ ही मुसलमानों के पवित्र माह रमजान का आगाज हो गया। गुरुवार को मुस्लिम बंधुओ ने पहला रोजा रखा। पहला रोजा 12 घंटे 50 मिनट का रहा। रमजान की शुरुवात होने के साथ ही मस्जिदों में तरावीह की नमाज और सेहरी व इफ्तार का सिलसिला शुरू हो गया है। माह के 30 दिन मुस्लिमबंधु रोजा रखकर खुद की इबादत में मशगुल रहेंगे। रमजान मुस्लिम समुदाय के लिए सबसे पवित्र महीना माना गया है। रमजान का महीना इस्लामी साल हिजरी का नौवां महीना होता है, जो बेहद खास होता है। रमजान का महीना चांद दिखने के बाद शुरू होता है, जो 18 फरवरी की शाम को देखा जा चुका है। इस पूरे महीने में 29 या 30 रोजे होते हैं और इनके पूरा होने पर ईद-उल-फ़ित्र का त्योहार मनाया जाएगा। बुधवार को रमजान का चांद नजर आते ही मुस्लिम समाज में खुशी की लहर दौड़ गई। शाम के समय युवक, महिलाएं एवं बच्चे चांद देखने के लिए घरों की छतों पर पहुंच गए। चांद का दीदार करने के बाद बड़े और बच्चों ने दुआ की। ईशा की नमाज के बाद मस्जिदों में तरावीह की नमाज अदा की गई। जैसे ही चांद के दीदार हुए, एक दूसरे को मुबारकबाद देने का सिलसिला शुरू हो गया। वहीं एक दूसरे को मोबाइल पर फोन व मैसेज के जरिए रमजान की आमद की मुबारकबाद दी गई। उलेमाओं द्वारा चांद दिखने की पुष्टि करते हुए मस्जिदों से रमजान की आमद का ऐलान किया गया। गुरुवार को रमजान का पहला रोजा रखा गया। मुस्लिम धर्म गुरुओं ने बताया कि इस्लामी कैलेंडर के अनुसार रमजान का महीना नौवां महीना होता है, जिसे सबसे पाक और खास माना जाता है। इस पूरे महीने मुसलमान सुबह से लेकर शाम तक यानी सूर्योदय होने से लेकर सूर्यास्त तक उपवास रखते हैं और कुरआन की तिलावत व पांच वक्त नमाज पढ़कर इबादतों में मशगूल रहते हैं।
पूरी अनुशासन का पालन कर रखते हैं रोजा
रोजे के दौरान लोग पूरी तरह अनुशासन का पालन करते हैं और बिना कुछ खाए-पिए रहते हैं। रमजान का महीना इस्लमी साल शाबान के महीने के बाद आता है। ये इस्लामी साल का नौवां महीना है। रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले कुछ खा कर शुरू किया जाता है, जिसे सेहरी कहते हैं। उसके बाद दिन भर खाने और पीने पर बन्दिश रहती है। उसके बाद शाम को सूरज डूबने के बाद इफ्तार किया जाता है। जिसे रोज़ा खोलना भी कहते हैं। रमजान महीने के 30 दिन के रोज़ों को तीन अशरों यानी हिस्सों में बांटा गया है। रमज़ान के पहले 10 दिन रहमत के, दूसरे 10 दिन बरकत के और आखिरी 10 दिन मगफिरत के कहे जाते हैं।
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