.कोरबा। छत्तीसगढ़ की लोक-आस्था, परंपरा और सनातन संस्कृति से गहराई से जुड़ा हरितालिका तीज पर्व इस बार विशेष संयोग लेकर आ रहा है। देव पंचांग के अनुसार 14 सितंबर सोमवार को हरितालिका तीज और श्रीगणेश चतुर्थी एक ही दिन पड़ रही है। तिथि का यह संयोग पर्व की धार्मिक महत्ता को और बढ़ा रहा है। पंचांगीय गणना के अनुसार चतुर्थी युक्त तृतीया में हरितालिका तीज का व्रत करना विशेष पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और शिव-पार्वती की आराधना करने से अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और दांपत्य सुख की प्राप्ति होती है। हरितालिका तीज की शुरुआत 13 सितंबर रविवार को करू भात से होगी। छत्तीसगढ़ में सदियों से चली आ रही इस परंपरा में महिलाएं व्रत से एक दिन पहले करेले की सब्जी और भात का सेवन करती हैं। इसके बाद 14 सितंबर सोमवार को महिलाएं निर्जला हरितालिका तीज व्रत रखेंगी। इसी दिन गणेश चतुर्थी का पर्व भी होने से श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अर्चना का विशेष अवसर रहेगा। अगले दिन 15 सितंबर मंगलवार को सूर्योदय के बाद विधिवत पारण कर व्रत खोला जाएगा और फलाहार ग्रहण किया जाएगा। 14 सितंबर को भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी होने के कारण इस दिन को कलंक चतुर्थी भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चतुर्थी की रात चंद्रमा के दर्शन करने से झूठे आरोप या अपयश का भय रहता है। इसलिए श्रद्धालुओं को इस दिन चंद्र दर्शन से बचने की सलाह दी जाती है। यदि भूलवश चंद्र दर्शन हो जाए तो दोष निवारण के लिए स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण या पठन करने की परंपरा बताई गई है। हरितालिका तीज से पहले करू भात खाने की छत्तीसगढ़ी परंपरा केवल धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि स्थानीय खान-पान और मौसम से जुड़ी परंपरा भी मानी जाती है। करेले की सब्जी और भात से तैयार करू भात व्रत से पहले भोजन के रूप में लिया जाता है। करेले को आयुर्वेद में कड़वे रस वाला माना गया है और पारंपरिक रूप से इसे पाचन तथा शरीर के संतुलन के लिए उपयोगी माना जाता है।
![]()
































