कोरबा। एसईसीएल की मानिकपुर खदान का सालाना उत्पादन 52.50 लाख टन से बढ़ाकर 70 लाख टन करने की कवायद के बीच खदान विस्तार से प्रभावित भूविस्थापितों के लंबित रोजगार, मुआवजा और पुनर्वास के मुद्दे एक बार फिर केंद्र में आ गए हैं। 21 अगस्त को प्रस्तावित जनसुनवाई ग्रामीणों के विरोध के बाद स्थगित किए जाने के बाद अब 25 सितंबर की नई तारीख तय की गई है। जनसुनवाई एसईसीएल कोरबा एरिया के कल्याण मंडप, मानिकपुर में होगी।
जनसुनवाई की नई तारीख घोषित होने से प्रबंधन के सामने महज खदान विस्तार की प्रक्रिया पूरी करने की चुनौती नहीं है, बल्कि वर्षों से लंबित भूविस्थापितों की मांगों का समाधान भी बड़ा मुद्दा बन गया है। प्रभावित ग्रामीण पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार, छूटे हुए मकानों और पात्र परिवारों को अधिकार दिलाने जैसी मांगों का निराकरण किए बिना वे जनसुनवाई का विरोध करेंगे। नई तारीख के अनुसार अब जनसुनवाई में करीब 09 दिन का समय शेष है। 21 अगस्त की जनसुनवाई स्थगित होने के बाद प्रभावितों को उम्मीद थी कि इस अवधि का उपयोग उनकी लंबित मांगों के निराकरण के लिए किया जाएगा। लेकिन बुधवार को भूविस्थापितों को दोबारा प्रशासन का ध्यान रोजगार और मुआवजे के लंबित मामलों की ओर आकर्षित कराना पड़ा। ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 1964 से 1968 के बीच अधिग्रहित जमीन के कई खातेदारों को अब तक रोजगार नहीं मिला है। वहीं कई किसानों को मुआवजे की पूरी राशि भी नहीं मिल सकी है। ऐसे में नई जनसुनवाई से पहले इन मामलों का समाधान नहीं हुआ तो एक बार फिर प्रबंधन और प्रभावित ग्रामीण आमने-सामने आ सकते हैं।
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कचांदी नाला बचाने डायवर्सन की मांग
मानिकपुर विस्तार से प्रभावित भिलाईखुर्द क्रमांक-1, 2 और 3, कुदरीखार, बरबसपुर, रापाखर्रा, ढेलवाडीह, कर्शनारा और कदमहाखार सहित गांवों के सामने भूमि अधिग्रहण के साथ प्राकृतिक जलस्रोत का भी सवाल है। ग्रामीणों के अनुसार खदान विस्तार से कचांदी नाला का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। यह नाला आसपास के खेतों की सिंचाई का प्रमुख साधन है। इसलिए ग्रामीण इसके अस्तित्व को बचाने के लिए डायवर्सन की मांग कर रहे हैं।
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उत्पादन बढ़े, लेकिन हक भी मिले
मानिकपुर खदान के विस्तार से कोयला उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य तय किया गया है, लेकिन प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि विकास की कीमत उनके अधिकारों की अनदेखी कर नहीं चुकाई जा सकती। ऐसे में 25 सितंबर की जनसुनवाई केवल पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया नहीं, बल्कि एसईसीएल और भूविस्थापितों के बीच लंबित मुद्दों के समाधान की अगली परीक्षा भी हो
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