कोरबा। मौसम में बदलाव के साथ बढ़ी नमी का असर अब धान की फसल पर दिखाई देने लगा है। खेतों में कीट और रोग का खतरा मंडराने लगा है। धान की फसल में तनाछेदक, शीथरॉट-शीथ ब्लाइट और रेड वर्म (लाल कीड़ा) के लक्षण सामने आ सकते हैं। कृषि जानकारों ने किसानों को शुरुआती अवस्था में ही लक्षणों की पहचान कर नियंत्रण के उपाय करने की सलाह दी है।
तनाछेदक कीट की इल्ली धान के तने में छेद कर अंदर चली जाती है। इससे तने का अंदरूनी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है और पौधा बाहर से सूखा दिखाई देने लगता है। इसके नियंत्रण के लिए दवा के का छिडक़ाव करने की सलाह दी जाती है। शीथरॉट और शीथ ब्लाइट के संक्रमण में पौधे के निचले हिस्से में हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं। संक्रमण बढऩे पर पत्तियां सडऩे लगती हैं और इसका सीधा असर फसल की बढ़वार पर पड़ सकता है।
रेड वर्म यानी लाल कीड़े के प्रकोप से धान की जड़ों की वृद्धि प्रभावित होती है। इससे पौधों की बढ़वार रुक सकती है। इसके नियंत्रण के लिए दवा को रेत में मिलाकर खेत में डालने की सलाह दी जाती है। कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को बिना लक्षण की पहचान किए शुरुआत में ही भारी मात्रा में कीटनाशक और फफूंदनाशक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। पहले फसल में दिखाई दे रहे लक्षणों के आधार पर कीट या रोग की पहचान करना जरूरी है। नियंत्रण के उपाय करने के बाद भी प्रकोप बना रहता है तो करीब 10 दिन के अंतराल पर दोबारा छिडक़ाव या भुरकाव किया जा सकता है। कीटनाशकों की मात्रा/डोज फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि विभाग की अनुशंसा के अनुसार ही तय की जानी चाहिए।
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