कोरबा। कक्षा में पढ़ रहे ऐसे बच्चों की पहचान अब केवल उनकी शैक्षणिक कमजोरी के आधार पर नहीं होगी, बल्कि उनके व्यवहार, सीखने की क्षमता और दिखाई देने वाले विशेष संकेतों को भी गंभीरता से लिया जाएगा। स्कूलों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की समय पर पहचान के लिए नई व्यवस्था लागू की जा रही है, जिसमें सामान्य शिक्षक पहली स्क्रीनिंग करेंगे। इसके बाद जरूरत वाले बच्चों को आगे की जांच और सहायता के लिए चिन्हित किया जाएगा।
इस पूरी प्रक्रिया में प्रशस्त 2.0 एप महत्वपूर्ण माध्यम होगा। सभी सामान्य शिक्षकों को इसके लिए प्रशिक्षण और संवेदीकरण पूरा करना अनिवार्य किया गया है। शिक्षकों को 31 अगस्त तक एप पर उपलब्ध 10 संवेदीकरण वीडियो पूरे देखने होंगे। वीडियो को बीच में छोडऩे, आगे बढ़ाने या स्किप करने की सुविधा नहीं होगी। यानी प्रशिक्षण पूरा करने के लिए प्रत्येक वीडियो देखना अनिवार्य होगा। स्कूलों में दिव्यांग बच्चों का नामांकन वर्तमान में करीब 0.8 प्रतिशत है। सरकार का मानना है कि यह आंकड़ा वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता और विशेष आवश्यकता वाले कई बच्चे अभी पहचान और औपचारिक शिक्षा व्यवस्था से बाहर हो सकते हैं। शुरुआती स्तर पर पहचान नहीं होने से बच्चों को उनकी जरूरत के मुताबिक शैक्षणिक सहयोग भी नहीं मिल पाता। नई व्यवस्था में इसी अंतर को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। शिक्षक बच्चों में दिखाई देने वाले संकेतकों के आधार पर प्रारंभिक स्क्रीनिंग करेंगे। संकेतकों को कोर और सपोर्टिव श्रेणियों में रखा गया है। इससे संभावित विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को शुरुआती चरण में ही चिन्हित किया जा सकेगा।
चार बार लग सकेंगे ब्लॉक स्तरीय शिविर
स्कूल स्तर पर चिन्हित बच्चों को आगे की जांच और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रत्येक ब्लॉक में साल में अधिकतम चार ब्लॉक स्तरीय पहचान शिविर आयोजित करने का प्रावधान किया गया है। इससे स्क्रीनिंग के बाद बच्चों को विशेषज्ञ सेवाओं से जोडऩे की प्रक्रिया को गति मिलने की उम्मीद है।
तीन से छह साल की उम्र पर भी नजर
नई व्यवस्था का दायरा स्कूल तक सीमित नहीं रखा गया है। प्राथमिक स्कूल परिसर में संचालित आंगनबाड़ी केंद्र और बालवाटिका के बच्चों की भी प्रशस्त 2.0 एप के माध्यम से स्क्रीनिंग की जाएगी। कम उम्र में विशेष आवश्यकता के संकेत मिलने पर बच्चे को समय रहते जरूरी उपचार, सहायता और शैक्षणिक सहयोग उपलब्ध कराया जा सकेगा।
शिक्षक बनेंगे पहली पहचान की कड़ी
प्रशस्त 2.0 व्यवस्था में शिक्षक की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं रहेगी। वह बच्चे में दिखाई देने वाले ऐसे संकेतों को पहचानने वाली पहली कड़ी भी होंगे, जिन पर आगे विशेषज्ञ जांच की जरूरत पड़ सकती है। इससे उम्मीद है कि जिन बच्चों की विशेष जरूरतें अब तक सामान्य कक्षा गतिविधियों के बीच छिपी रह जाती थीं, उनकी पहचान पहले ही चरण में हो सकेगी।
![]()
































