कोरबा। घर के आंगन में 14 साल बाद किलकारी गूंजने की उम्मीद से परिवार के सदस्य बेहद खुश थे, लेकिन अस्पताल में हुई चूक के कारण दुनियां में आने के बाद जुड़वां बच्चों ने कुछ घंटे के अंतराल में दम तोड़ दिया। घटना से आक्रोशित परिजन आयुष्मान हास्पिटल जा पहुंचे। उन्होंने अस्पताल के सामने प्रदर्शन शुरू कर दिया। वे प्रबंधन के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। पुलिस और प्रशासन की टीम ने समझाईश देते हुए 14 बिंदुओं में जांच का आश्वासन दिया, तब कहीं जाकर प्रदर्शन समाप्त हुआ। शहर के मुड़ापार बस्ती में शशीकांत ओझा निवास करते हैं। उनकी शादी करीब 14 साल पहले सुकन्या ओझा से हुआ था। परिजनों ने कहा कि वे14 साल बाद पत्नि के पांव भारी होने से बेहद खुश थे। श्री ओझा ने प्रसव पीड़ा होने पर पत्नि को 16 जुलाई की शाम शारदा बिहार स्थित आयुष्मान हास्पिटल मे भर्ती कराया, जहां अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. ज्योति श्रीवास्तव द्वारा गर्भवती महिला का सोनोग्राफी कराया गया। सोनोग्राफी के बाद बच्चों का वजन 2.5 व 2.8 किलो बताया गया, लेकिन जुड़वां बच्चों के जन्म के बाद रिपोर्ट झूठा साबित हो गया। इसके बावजूद जुड़वां बच्चों के जन्म से परिजनों की खुशी का ठिकाना नही था। उनके लंबे अर्से बाद घर के आंगन में किलकारी गूंजने से फूले नही समा रहे थे, लेकिन उनकी खुशी प्रबंधन की लापरवाही की भेंट चढ़ गई। नवजातों में जन्म के कुछ ही देर बाद पीलिया के लक्षण दिखने लगे। जिसकी जानकारी देने के बाद भी डॉक्टर नजर अंदाज करने लगे। जब एक बच्चे की हालत गंभीर होने पर उसे रेफर किया गया। परिजन नवजात को लेकर निजी अस्पताल पहुंचे, जहां उसकी मौत हो गई। परिजनों को उस वक्त गहरा झटका लगा, जब दूसरे बच्चे को हालत बिगड़ने पर बिलासपुर के अस्पताल में दाखिल कराया गया था। उसने भी इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। परिजन एक बच्चे की मौत् से पहले ही दुखी और आक्रोशित थे। उनका आक्रोश को दूसरे बच्चों की मौत ने बढ़ा दिया। वे सोमवार की दोपहर आयुष्मान हास्पिटल पहुंचे। उन्होंने हास्पिटल के सामने प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस दौरान प्रबंधन के खिलाफ जमकर नारेबाजी शुरू कर दी। परिजन प्रबंधन के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे। हास्पिटल के सामने प्रदर्शन की खबर मिलते ही पुलिस व प्रशासन के अफसर भी मौके पर जा पहुंचे। अफसरों ने पीड़ित परिवार को समझाईश दी, लेकिन वे प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की मांग पर अड़ गए। उनका आरोप था कि बच्चों की तबीयत बिगड़ने पर डॉक्टर से रेफर करने की बात कही गई, लेकिन डॉक्टर ने उल्टे उनसे ही नाराजगी जताई। जब हालत बिगड़ी तो रेफर करने की बात कही गई। बच्चे को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, लेकिन नर्स उसे बिना आक्सीजन एम्बुलेंस तक ले आई। बातचीत करने पर वह आक्सीजन ऊपर लेकर आने की बात कहने लगी। परिजनों ने अफसरों के सामने प्रबंधन पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग करने लगे। उन्होंने प्रशासनिक अफसरों को ज्ञापन भी सौंपा। प्रशासनिक अफसरों ने उनकी मांग पर 14 बिंदुओं पर जांच के आश्वासन दिए, तब कहीं जाकर प्रदर्शन समाप्त हुआ।परिजनों की आरोप है कि पहले बच्चे की मौत के बाद प्रसूता का उपचार भी बंद कर दिया गया। पूछताछ करने पर दवाई देने के दावे किए गए। नर्स व महिला चिकित्सक द्वारा बच्चे को लेकर अशोभनीय टिप्पणी की गई। सीसीटीवी कैमरे का फुटेज मांगने पर गोलमोल जवाब दिया जाने लगा। एक नर्स को सिखा पढ़ाकर आगे कर दिया गया, जो दवा देने का दावा कर रही थी। जब एफआईआर कराने की बात कहीं गई तो वह दावे से ही मुकर गई। उसने रूम में जाने और दवाई देने की बात से ही इंकार कर दिया।
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