कोरबा। जिले में औद्योगिक संयंत्रों की भरमार है, जहां ठेका कंपनियों में स्थानीय के अलावा दीगर प्रांत के मजदूर काम करते हैं। नियमानुसार मजदूरों का चरित्र सत्यापन अनिवार्य है, ताकि मजदूरों की आड़ में अपराधिक प्रवृत्ति के लोग संयंत्र के भीतर न पहुंचे। कंपनियों में नियम की अनदेखी की जा रही है। जिसका जीता जागता उदाहरण उस वक्त देखने को मिला, जब पुलिस पिता की हत्या के मामले मे सजा काट रहे कैदी को गिरफ्तार कर लिया। वह सेंट्रल जेल बिलासपुर से पैरोल पर रिहा होने के बाद छह साल से फरार था। पुलिस ने उसे वैधानिक कार्रवाई उपरांत कोर्ट में पेश किया है। बालको थानांतर्गत परसाभांठा में दशेराम कुर्रे निवास करता था। उसकी साल 2007 में हत्या कर दी गई थी। बालको पुलिस ने मामले की जांच पड़ताल शुरू की। इस दौरान हत्या के मृतक के पुत्र देवानंद कुर्रे व सूरज कुर्रे की भूमिका उजागर हुई। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 449 व 34 के तहत कार्रवाई करते हुए आरोपियों को न्यायालय में पेश कर दिया था। मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश एफटीसी के न्यायालय में चल रही थी। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान दोषी पाए जाने पर दोनों भाईयों को आजीवन कारावास व 12-12 हजार अर्थदंड से दंडित किया था। न्यायालय से आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने पर दोषियों को बिलासपुर सेंट्रल जेल शिफ्ट कर दिया गया । वे सेंट्रल जेल में सजा काट रहे थे। दोनों आरोपियों ने वर्ष 2020 में पैरोल पर रिहाई के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।जिसकी सुनवाई उपरांत 7 अप्रेल से पैरोल पर रिहाई का आदेश जारी हुआ था। उन्हें 1 मई को पुन: हाजिर होना था,लेकिन दोनों फरार हो गए। मामले में करीब पांच साल बाद बालको थाने में शिकायत दर्ज कराई गई थी। मामले को पुलिस कप्तान सिद्धार्थ तिवारी ने गंभीरता से लिया। उनके निर्देश एएसपी लखन पटले व सीएसपी कोरबा प्रतीक चतुवेर्दी के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी युवराज तिवारी अपनी टीम के साथ कैदियों की पतासाजी में जुटी हुई थी। इसी दौरान पुलिस को पैरोल पर रिहा होने के बाद फरार देवानंद कुर्रे के घर में होने की सूचना मिली। मुखबीर की सूचना मिलते ही पुलिस ने दबिश देते हुए फरार कैदी देवानंद को दबोच लिया। पूछताछ करने पर पता चला कि देवानंद पैरोल पर रिहा होने के बाद कुछ दिनों के लिए बलौदा थाना क्षेत्र में स्थित गृहग्राम गया था, जहां से लौटने के बाद वह क्षेत्र में स्थित संयंत्र के भीतर ठेका कंपनी में काम कर रहा था। उसने ठेका कंपनी में नौकरी पाने सभी जरूरी दस्तावेज भी जमा कराए थे। संयंत्र के भीतर ठेका कंपनी में कैदी के काम करने का मामला उजागर होने के बाद मजदूरों के चरित्र सत्यापन को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। मामले को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। बहरहाल पुलिस ने पकड़े गए कैदी को वैधानिक कार्रवाई उपरांत कोर्ट में पेश कर दिया है, जबकि दूसरे फरार कैदी की सरगर्मी से तलाश की जा रही है। जिले में औद्योगिक संयंत्रों की भरमार है, जहां ठेका कंपनियों मे हजारों की तादाद में मजदूर काम करते हैं। इसके अलावा निजी और सरकारी संस्थानों में भी प्लेसमेंट एजेंसी के कर्मचारी कार्यरत हैं। कंपनी द्वारा मजदूरों के चरित्र सत्यापन कराए जाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन संबंधित विभाग द्वारा मानिटरिंग नही की जाती। जिसका फायदा अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को मिलता है। मजदूरों का चरित्र सत्यापन सुरक्षा व विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी प्रक्रिया है। पुलिस वेरीफिकेशन के लिए निर्धारित प्रारूप में जानकारी देना अनिवार्य होता है। यह प्रक्रिया ऑफ व आन लाइन दोनों तरह से पूरी की जा सकती है। किसी भी संयंत्र में प्रवेश के लिए सत्यापन के आधार पर ही गेट पास जारी किया जाता है। यदि पैरोल पर रिहा होने के बाद फरार कैदी के मामले में जांच की जाए तो बड़ा खुलासा हो सकता है।
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